गोधन

गोधन

गुरुकुल में गोधन केवल पशुपालन नहीं है, यह हमारी जीवन-दृष्टि का एक अंग है। भारतीय परंपरा में गौ को केवल दुग्ध देने वाले प्राणी के रूप में नहीं देखा गया, अपितु परिवार, कृषि, स्वास्थ्य और धर्म के आधार के रूप में सम्मान दिया गया है।

वर्तमान में गुरुकुल में गौवंश हैं—

  • दामोदर — नंदी
  • गौरी — गौमाता
  • सुंदरी — बछिया

इनकी सेवा एवं पालन हेतु प्रति माह लगभग—

  • १ कुंतल अन्न
  • ३ कुंतल भूसा
  • आवश्यक हरा चारा

गौग्रास की परंपरा

भारतीय गृहस्थ जीवन में भोजन ग्रहण करने से पूर्व गौग्रास निकालने की परंपरा रही है। इसका अर्थ केवल पशु को भोजन देना नहीं, अपितु अपने अन्न में समस्त जीवन की सहभागिता को स्वीकार करना है।

गौग्रास हमें स्मरण कराता है कि अन्न केवल हमारे लिए नहीं है। उसमें प्रकृति, पशु, पक्षी, भूमि और समाज सभी का अधिकार है।

गौसेवा का महत्व

गौसेवा का अर्थ केवल गाय को भोजन देना नहीं, बल्कि करुणा, संरक्षण और उत्तरदायित्व का अभ्यास करना है। जो समाज अपने निर्बल, मूक और आश्रित प्राणियों की रक्षा करता है, वही दीर्घकाल तक संस्कारित बना रहता है।

गुरुकुल में बालक गौसेवा के माध्यम से श्रम, संवेदनशीलता, अनुशासन और कृतज्ञता का अभ्यास करते हैं।

अन्नदान का अवसर

यदि आप गुरुकुल के गोधन में सहभागी होना चाहते हैं तो गौग्रास, अन्न, भूसा, हरा चारा अथवा आर्थिक सहयोग के माध्यम से योगदान कर सकते हैं।

आपका छोटा सा सहयोग भी गोधन के पालन में सहायक होगा तथा गुरुकुल के बालकों को जीवंत गौसंस्कृति के संरक्षण में सहयोग देगा।

"गौसेवा केवल दान नहीं, जीवन के प्रति कृतज्ञता का एक सरल अभ्यास है।"
आपका सहयोग सादर आमंत्रित है।
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